Tuesday, July 16, 2013

शरम आंख्यां की - अज्ञात

जेठ साढ़ को तावड़ो ठाडी बरसे लाय
घूंघट काड्या  बीनणी बैठी गरम्याँ मांय
 बैठी गरम्याँ मांय  उमस सूं  जी घबरावे
सुसरो जी री काण घूंघटो कियाँ हटावे
खूब अजब दस्तूर अचंभो म्हाने आवे
मुंडे सूं बोले बाप बाप सूं शकल ल्हुकावे
घूंघट  करद्यो बंद काईँ परदे में नाखो
परदे की के काण शर्म आंख्यां की राखो

                                            - अज्ञात

Wednesday, May 23, 2012

किण नै बोलाँ बावला - शिव मृदुल

रूँख लगाया राख्या कोनी मीठा फल भी चाख्या कोनी ,
स्वारथ  री ले हाथ कुल्हाड़ी काटन हुया उतावला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।
   
ज्यूँ ज्यूँ रूँख कट्या मंगरा सू मिनखपणै  री जड़ कटगी ,
पैला मन में बनी दीवाराँ धरती टुकडाँ  मैं बँटगी ,
हेत रेत  रै पैंदे दब्ग्यो खेत बदल्ग्या बस्ती में ,
वन रे थोर मिला री चिमण्या धुओं उगल री मस्ती में,
कट्या  नीम बड पीपल चन्दन , केर,  टीमरू, आँवला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।

चोफेर है हवा धुवादी जहर घुल्यो जिनगाणी में ,
गजब गन्दगी घुल्बा लागी इमरत जैडा पानी में  ,
 सुख रो सागर सूखो निकल्यो सपना बिक्या उधारी में ,
खुशबू री आसा में उगी बदबू केसर क्यारी में ,
मानसरोवर पूक्या बगला तन उजला मन साँवला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।
बगुला री एकत है ठाडी हंस गिणत में थोड़ा है ,
मानसरोवर गुदलो होगो या हंसा में फोड़ा है ,
झीलां में जलकुम्भी पसरी जल में कमल खिले कोनी ,
चुगबा खातर  याँ हँसा ने मोती आज मिले कोनी,
बगुला रे घर माँडा माही रहवे हंस कन्यावाला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।

डोर धनुष री टूटी टूटी तीर पड्या सब तरकश में ,
पडी गुफायाँ सगली सूनी शेर घुस्या सब सरकस में ,
 पिंजरा में वनराज पीठ पे चाबूका नित झेले है ,
जंगला माँही चोडै दहाड़े स्यार कबड्डी खेले है ,
भूखा तिसाया हिरन फिरे अर गोठ करे है कावला,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।

शिव मृदुल 


Friday, November 25, 2011

कांई पूछैलो बाबा - अज्ञात

आटै-दाळ रो भाव जाण लियो, और कांई पूछैलो बाबा ।
मंहगाई री बातां करां तो, काळजियो धूजैलो बाबा ॥

मोडा-नेता मंत्रबाज सहै, परजा ऊपर फूंक मार रया ।
तूं भी कोई अफंड रचालै, सगळो जग पूजैला बाबा ॥

संसद ऊपर गोळी चालै, बाथरूम में लुक ज्यावैला ।
हत्यारा हलुओ खावैला, तूं बिरथा कूकैलो बाबा ॥

लाधड़ियै में रहणो है तो, हां जी, हां जी कहता जावो ।
बात सांचली कह गेरी तो, तेरो गळो टूंपलो बाबा ॥

जे कोई मिलग्यो सांड आबखो, अहड़ी लात लगा देसी ।
धरम-करम धूळ में रळसी, जमलोकां पूगैलो बाबा ॥
                                              - अज्ञात 

Wednesday, April 20, 2011

हेली - ताऊ शेखावाटी

हेली जलम्यो है बो मरसी, ईं में बोल राम के करसी।
मंदिर धोकर चाए मसजिद, गुरुद्वाराँ अरदास कर्याँ नित।
काम न आणी कोई भी बिध, तूँ जितणी भी करसी।
हेली! जलम्यो है वो मरसी, जग में जीव जळम निज पाताँ।
लेखो लेती हाथूँ-हाथाँ, साँस जिता घालै बेमाता।
उतणा लेणा पड़सी, हेली! जळम्यो है बो मरसी।
क्यूँ होरी है करड़ी-काठी, काळचक्र गति जाय न डाटी।
सब नैं हीं मिलणो है माटी, घींस्यो हो या घड़सी।
हेली! जळम्यो है बो मरसी, होणी कदै टळै नीं टाळी।
रीत सदाँ स्यूँ आई चाली, पल्लव नुवाँ उगंताँ डाळी।
पात पुराणाँ झड़सी, हेली! जळम्यो है बो मरसी।
                                  - ताऊ शेखावाटी 

Saturday, April 2, 2011

एक छोरी काळती - भागीरथ सिंह भाग्य

एक छोरी काळती हमेशा जीव बाळती,
सींवा जोड़ खेत म्हारो चाव सूँ रूखाळती |(एक छोरी...

ऊंचा ऊंचा टीबडा मै रूंखड़ा रो खेत हो ,
खेत रुजगार म्हारो खेत सूँ ही हेत हो |
हेत हरियाल्या नै तावडा सूँ टाळती || (एक छोरी ...

बेल बीरो शीश फूल फूल बीरी राखड़ी,
एक बार आखडी तो बार बार आखडी |
लाज सूँ झुकी झुकी सी लूगड़ी संभाळती|| (एक छोरी ...

भोत राजी रेवती तो झूपडी बुहारती ,
रूसती तो गाव्ड्या नै बाछड़ा नै मारती |
हेत जै जणावती तो टींडसी उछाळती || (एक छोरी ...

गाँव रै गुवाड़ बीच देखती ना बोलती ,
हेत सूँ बुलावता तो आँख भी ना खोलती |
खेत मै ना जावता तो गाळीयाँ निकालती ||(एक छोरी ....
                                                                    - भागीरथ सिंह भाग्य 

Monday, March 21, 2011

मत दीजे परदेस - भागीरथ सिंह भाग्य

लोग न जाणै कायदा ना जाणै अपणेस । राम भलाईँ मौत दे मत दीजै परदेस  ||
ना सुख चाहु सुरग रो नरक आवसी दाय। म्हारी माटी गांव री गळियाँ जै रळ जाय॥
जोगी आयो गांव सूँ ल्यायो ओ समचार । काळ पड्यो नी धुक सक्यो दिवलाँ रो त्युहार् ॥
इकतारो अर गीतडा जोगी री जागीर । घिरता फिरतापावणा घर घर थारो सीर ॥
आ जोगी बंतल कराँ पूछा मन री बात । उगता हुसी गांव मँ अब भी दिन अर रात ॥
जमती हुसी मैफलाँ मद छकिया भोपाळ । देता हुसी आपजी अब पी कै गाळ ॥
दारू पीवै आपजी टूट्यो पड्यो गिलास । पी कै बोलै फारसी पड्या न एक किलास ॥
साँझ ढल्याँ नित गाँव री भर ज्याती चौपाळ । चिलमा धूँवा चालती बाताँ आळ पताळ ॥
पाती लेज्या डाकिया जा मरवण रै देश । प्रीत बिना जिणो किसो कैजे ओ सन्देश ॥
काळी कोसा आंतरै परदेशी री प्रीत । पूग सकै तो पूग तूँ नेह बिजोगी गीत ॥
मरवण गावै पीपली तेजो गावै लोग । मै बैठयो परदेश मँ भोगू रोग बिजोग ।।
सावण आयो सायनी खेता नाचै मोर । म्हारै नैणा रात दिन गळ गळ जावै मोर ॥
                                                                                          - भागीरथ सिंह भाग्य 

Friday, March 4, 2011

खेतां री प्रीत

जद सूँ पाकी बाजरी काचर मोठ समेत , दिन भर नापै चाव सूँ पटवारी जी खेत |
होगी सोळा साल री बेटी करै बणाव , कद निपजैली टीबडी कद मांडूला ब्याव |
टाबर टींगर मोकळाँ करजै री भरमार , राम रूखाळी राखजै थाँ सरणै घरबार |
उगतो पिणघट ऊपराँ सुणतो मिठी बात , गळी गुवाडी घूमतो चान्दो सारी रात |
सांझ ढळ्याँ नित जांवता देखै सारो गांव, पिरमा थारी लाडली पटवारी रै ठांव |
छैल सहर सूँ बावडै खरचै धोबा धोब, पडै गांव मै रात दिन पटवारी सा रोब |
प्रीत आपरी अचपळी घणी करै कुचमाद, सुपना मै सामी रवै जाग्या आवै याद |
राग रंग नी आवडै कींकर उपजै तान, घर मै कोनी बाजरी अर टूट्योडी छान |
बिन हरियाळी रूंखडा घरघूल्या सा ठांव, ’राही’ दीखै दूर सूँ थारो आधो गांव |
गाय चराती छोरडयाँ जोबन सूँ अणजाण, देख ओपरा जा लूकै कर जांटी री आण
के तडपासी बादळी के कोयल री कूक , पैली ही सूँ काळजो हुयो पड्यो दो टूक |
ना आंचळ ना घूंघटो ना हीवडै मै लाज , घिरसत पाळै गोरडी रोटी पोवै राज |
धान महाजन रै घराँ ढोर बिक्या बे दाम , करज पुराणो बाप रो कीयाँ चुकै राम | 
ठाला बिन रूजगार कै ताना देता लोग,भरी न हाली गांव सूँ मनस्या बाळण जोग
                                                                           
                                                                            - लेखक अज्ञात 
                                                                           संकलनकर्ता जाबिर खान