Saturday, March 21, 2015

गाय की रोटी - जगदीश पेन्टर

एक भूखी भटकती गाय घर के सामने आगी
या देख कर घर हाली लाठी लेकर भागी
बोली खा तेरै धणी नै अठै के मांगै है
दो तीन मार दीनी गाय फेर भी नहीं भागै  है
मेरै आँख्याँ मैं पाणी आगो पण कुछी कोनी बोल्यो
कई देर सोच्यो कांई करूँ मन आत्मा नै टटोल्यो
आत्मा बोली गाय नै रोटी दे दयूं
मन बोल्यो तू आँनै पालसी तो तनै कुण घालसी
सोच्यो एक रोटी की खातिर भाई सूँ भाई न्यारा होरया है
और बिना मतलब ही आँसू बहारया है
सब्र को बाँध ही टूटगो माँय सूँ हियो ही फूटगो
पण अब तक भी घर हाली लाठी लियाँ खड़ी ही
बा गाय भी कोनी मानी दरवाजे के सामने अड़ी ही
ना तो गाय हालै ना ही घर हाली मानै
गाय तो भूखी ही कुण जाय दोन्यां नै समझावै
मैं दोन्या के बीच में बोल्यो तू आज्या बा चल ज्यासी
लाठी मेरे कानी कर घर हाली बोली भगाबा दयो अबार गोबर कर ज्यासी
मैं बोल्यो स्याणी रहण दे या मते ही आगे चालसी
आपाँ तो कोई घालां अगला घर हाला घालसी
घर मैं आयी तो म्हाने समझाबा लागी अइयां दिन घालसी
रोटी पोती पोती मरगी  आपणा टाबरां नै कुण घालसी
मन मैं सोची हे भगवान कुणसा खेल खेल रहयो है
भाग मैं लिख्योड़ा आज ही दे क्यूँ म्हाने ललचा रहयो है
एक रोटी की खातर कैयां जीनो मरणो है
लुगाई नै मनाई घणी ही समझाई पण मानी कोनी
बोली जे ई नै दी तो थाने खाणी कोनी
हिम्मत कर बोल्यो आधी ही दे दे बदला मैं मेरी आज की सारी ले ले
लुगाई समझायेडी मानी कद भगवान सगळा ने दे या जाणी कद
साँची बात पर आणो पड़सी थाने बता रहयो हूँ
इसी  बातां कर थारो भी जीव लजा रहयो हूँ
एक रोटी सूँ कुणसो गाय को पेट भरतो
एक रोटी गाय नै दियां कुणसो जीतो मरतो
दूध देवे जड़ तक पालसी दूध हटयाँ पाछे बीड मैं घालसी
पण हाल भी बात बाकी है थे बताओ झूटी है के साँची है
गाय अङ्गी लुगाई भिड़गी
बा लाठी सूँ मार रही है पण गाय फेर भी नहीं हाल रही है
आज तो रोटी लेकर ही जाउंगी नहीं दियाँ अठै ही मर ज्याऊंगी
लुगाई मानगी गाय आगे चालगी
जाती जाती मने कहगी कलजुग की गंगा बहगी
शर्म कर ले तेरी भी दशा होणी है  लुगाई सूँ मतलब राख नहीं तो खोणी है
यो सुणता ही होश आगो और लुगाई ने बतागो
आज के बाद जीयो चाहे मरो पण गाय ने रोटी देणो है
मन मैं धार ली है बदला मैं कुछ नहीं लेणो है
नरक मिले या सुरग आपणो सात जन्मां को साथ है
एक रोटी देणो तो आपणे दोन्यां के हाथ है
जाण स्याणी पिछाण स्याणी जिकी दूध देवे बा माँ होवे  है
आने रोटी ना देकर क्यूँ आपणा दीदा खोवे है
लुगाई जात मानी कोनी पाछी समझावण लागी
घराँ घणो टोटो है सारो घाटो बतावण लागी
बातां चाल री म्हारी गाय बा पाछी आगी
जाती जाती घर को पोली ने खटखटागी
भाग कर देखो विधाता आयी है सगळे कुटुंब को नसीब सागे ल्याई है
देख्यो तो बा ही बात क्यूँ भी कोई बदल पाया
बा ही गाय बा ही घर हाली म्हे भी घर सूँ बारे निकल आया
अब तो रोणे को भी बहानो कोई गाय हाली भी खड़ी थी
हर दरवाजे पर मेरी घर हाली की जियां लुगायां लाठी ले'र खड़ी थी
पण बा भूखी गाय अब भी रोटी खातर अड़ी थी  

                                                                   - जगदीश पेन्टर

Tuesday, July 16, 2013

शरम आंख्यां की - अज्ञात

जेठ साढ़ को तावड़ो ठाडी बरसे लाय
घूंघट काड्या  बीनणी बैठी गरम्याँ मांय
 बैठी गरम्याँ मांय  उमस सूं  जी घबरावे
सुसरो जी री काण घूंघटो कियाँ हटावे
खूब अजब दस्तूर अचंभो म्हाने आवे
मुंडे सूं बोले बाप बाप सूं शकल ल्हुकावे
घूंघट  करद्यो बंद काईँ परदे में नाखो
परदे की के काण शर्म आंख्यां की राखो

                                            - अज्ञात

Wednesday, May 23, 2012

किण नै बोलाँ बावला - शिव मृदुल

रूँख लगाया राख्या कोनी मीठा फल भी चाख्या कोनी ,
स्वारथ  री ले हाथ कुल्हाड़ी काटन हुया उतावला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।
   
ज्यूँ ज्यूँ रूँख कट्या मंगरा सू मिनखपणै  री जड़ कटगी ,
पैला मन में बनी दीवाराँ धरती टुकडाँ  मैं बँटगी ,
हेत रेत  रै पैंदे दब्ग्यो खेत बदल्ग्या बस्ती में ,
वन रे थोर मिला री चिमण्या धुओं उगल री मस्ती में,
कट्या  नीम बड पीपल चन्दन , केर,  टीमरू, आँवला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।

चोफेर है हवा धुवादी जहर घुल्यो जिनगाणी में ,
गजब गन्दगी घुल्बा लागी इमरत जैडा पानी में  ,
 सुख रो सागर सूखो निकल्यो सपना बिक्या उधारी में ,
खुशबू री आसा में उगी बदबू केसर क्यारी में ,
मानसरोवर पूक्या बगला तन उजला मन साँवला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।
बगुला री एकत है ठाडी हंस गिणत में थोड़ा है ,
मानसरोवर गुदलो होगो या हंसा में फोड़ा है ,
झीलां में जलकुम्भी पसरी जल में कमल खिले कोनी ,
चुगबा खातर  याँ हँसा ने मोती आज मिले कोनी,
बगुला रे घर माँडा माही रहवे हंस कन्यावाला ,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।

डोर धनुष री टूटी टूटी तीर पड्या सब तरकश में ,
पडी गुफायाँ सगली सूनी शेर घुस्या सब सरकस में ,
 पिंजरा में वनराज पीठ पे चाबूका नित झेले है ,
जंगला माँही चोडै दहाड़े स्यार कबड्डी खेले है ,
भूखा तिसाया हिरन फिरे अर गोठ करे है कावला,
बोलो किण  रा  काम सरावाँ किण  नै  बोलाँ बावला ।

शिव मृदुल 


Friday, November 25, 2011

कांई पूछैलो बाबा - अज्ञात

आटै-दाळ रो भाव जाण लियो, और कांई पूछैलो बाबा ।
मंहगाई री बातां करां तो, काळजियो धूजैलो बाबा ॥

मोडा-नेता मंत्रबाज सहै, परजा ऊपर फूंक मार रया ।
तूं भी कोई अफंड रचालै, सगळो जग पूजैला बाबा ॥

संसद ऊपर गोळी चालै, बाथरूम में लुक ज्यावैला ।
हत्यारा हलुओ खावैला, तूं बिरथा कूकैलो बाबा ॥

लाधड़ियै में रहणो है तो, हां जी, हां जी कहता जावो ।
बात सांचली कह गेरी तो, तेरो गळो टूंपलो बाबा ॥

जे कोई मिलग्यो सांड आबखो, अहड़ी लात लगा देसी ।
धरम-करम धूळ में रळसी, जमलोकां पूगैलो बाबा ॥
                                              - अज्ञात 

Wednesday, April 20, 2011

हेली - ताऊ शेखावाटी

हेली जलम्यो है बो मरसी, ईं में बोल राम के करसी।
मंदिर धोकर चाए मसजिद, गुरुद्वाराँ अरदास कर्याँ नित।
काम न आणी कोई भी बिध, तूँ जितणी भी करसी।
हेली! जलम्यो है वो मरसी, जग में जीव जळम निज पाताँ।
लेखो लेती हाथूँ-हाथाँ, साँस जिता घालै बेमाता।
उतणा लेणा पड़सी, हेली! जळम्यो है बो मरसी।
क्यूँ होरी है करड़ी-काठी, काळचक्र गति जाय न डाटी।
सब नैं हीं मिलणो है माटी, घींस्यो हो या घड़सी।
हेली! जळम्यो है बो मरसी, होणी कदै टळै नीं टाळी।
रीत सदाँ स्यूँ आई चाली, पल्लव नुवाँ उगंताँ डाळी।
पात पुराणाँ झड़सी, हेली! जळम्यो है बो मरसी।
                                  - ताऊ शेखावाटी 

Saturday, April 2, 2011

एक छोरी काळती - भागीरथ सिंह भाग्य

एक छोरी काळती हमेशा जीव बाळती,
सींवा जोड़ खेत म्हारो चाव सूँ रूखाळती |(एक छोरी...

ऊंचा ऊंचा टीबडा मै रूंखड़ा रो खेत हो ,
खेत रुजगार म्हारो खेत सूँ ही हेत हो |
हेत हरियाल्या नै तावडा सूँ टाळती || (एक छोरी ...

बेल बीरो शीश फूल फूल बीरी राखड़ी,
एक बार आखडी तो बार बार आखडी |
लाज सूँ झुकी झुकी सी लूगड़ी संभाळती|| (एक छोरी ...

भोत राजी रेवती तो झूपडी बुहारती ,
रूसती तो गाव्ड्या नै बाछड़ा नै मारती |
हेत जै जणावती तो टींडसी उछाळती || (एक छोरी ...

गाँव रै गुवाड़ बीच देखती ना बोलती ,
हेत सूँ बुलावता तो आँख भी ना खोलती |
खेत मै ना जावता तो गाळीयाँ निकालती ||(एक छोरी ....
                                                                    - भागीरथ सिंह भाग्य 

Monday, March 21, 2011

मत दीजे परदेस - भागीरथ सिंह भाग्य

लोग न जाणै कायदा ना जाणै अपणेस । राम भलाईँ मौत दे मत दीजै परदेस  ||
ना सुख चाहु सुरग रो नरक आवसी दाय। म्हारी माटी गांव री गळियाँ जै रळ जाय॥
जोगी आयो गांव सूँ ल्यायो ओ समचार । काळ पड्यो नी धुक सक्यो दिवलाँ रो त्युहार् ॥
इकतारो अर गीतडा जोगी री जागीर । घिरता फिरतापावणा घर घर थारो सीर ॥
आ जोगी बंतल कराँ पूछा मन री बात । उगता हुसी गांव मँ अब भी दिन अर रात ॥
जमती हुसी मैफलाँ मद छकिया भोपाळ । देता हुसी आपजी अब पी कै गाळ ॥
दारू पीवै आपजी टूट्यो पड्यो गिलास । पी कै बोलै फारसी पड्या न एक किलास ॥
साँझ ढल्याँ नित गाँव री भर ज्याती चौपाळ । चिलमा धूँवा चालती बाताँ आळ पताळ ॥
पाती लेज्या डाकिया जा मरवण रै देश । प्रीत बिना जिणो किसो कैजे ओ सन्देश ॥
काळी कोसा आंतरै परदेशी री प्रीत । पूग सकै तो पूग तूँ नेह बिजोगी गीत ॥
मरवण गावै पीपली तेजो गावै लोग । मै बैठयो परदेश मँ भोगू रोग बिजोग ।।
सावण आयो सायनी खेता नाचै मोर । म्हारै नैणा रात दिन गळ गळ जावै मोर ॥
                                                                                          - भागीरथ सिंह भाग्य 

Friday, March 4, 2011

खेतां री प्रीत

जद सूँ पाकी बाजरी काचर मोठ समेत , दिन भर नापै चाव सूँ पटवारी जी खेत |
होगी सोळा साल री बेटी करै बणाव , कद निपजैली टीबडी कद मांडूला ब्याव |
टाबर टींगर मोकळाँ करजै री भरमार , राम रूखाळी राखजै थाँ सरणै घरबार |
उगतो पिणघट ऊपराँ सुणतो मिठी बात , गळी गुवाडी घूमतो चान्दो सारी रात |
सांझ ढळ्याँ नित जांवता देखै सारो गांव, पिरमा थारी लाडली पटवारी रै ठांव |
छैल सहर सूँ बावडै खरचै धोबा धोब, पडै गांव मै रात दिन पटवारी सा रोब |
प्रीत आपरी अचपळी घणी करै कुचमाद, सुपना मै सामी रवै जाग्या आवै याद |
राग रंग नी आवडै कींकर उपजै तान, घर मै कोनी बाजरी अर टूट्योडी छान |
बिन हरियाळी रूंखडा घरघूल्या सा ठांव, ’राही’ दीखै दूर सूँ थारो आधो गांव |
गाय चराती छोरडयाँ जोबन सूँ अणजाण, देख ओपरा जा लूकै कर जांटी री आण
के तडपासी बादळी के कोयल री कूक , पैली ही सूँ काळजो हुयो पड्यो दो टूक |
ना आंचळ ना घूंघटो ना हीवडै मै लाज , घिरसत पाळै गोरडी रोटी पोवै राज |
धान महाजन रै घराँ ढोर बिक्या बे दाम , करज पुराणो बाप रो कीयाँ चुकै राम | 
ठाला बिन रूजगार कै ताना देता लोग,भरी न हाली गांव सूँ मनस्या बाळण जोग
                                                                           
                                                                            - लेखक अज्ञात 
                                                                           संकलनकर्ता जाबिर खान  

Saturday, January 22, 2011

क़सर नहीं है स्याणै में - भागीरथ सिंह भाग्य

सुख को कनको उड़तो कीया काण राख दी काणै में |
खोयो ऊँट घडै मै ढूडै कसर नहीं है स्याणै में ||
भूल चूक सब लेणी देणी ठग विद्या व्यापार करयो |
एक काठ की हांडी पर ही दळियो सौ बर त्यार करयो ||
बस पङता तो एक न छोड्यो च्यारू मेर सिवाणै मै |
खोयो ऊँट घडै में ढूँढे कसर नहीं है स्याणै मै


डाकण बेटा दे या ले , आ भी बात बताणी के |
तेल बड़ा सू पैली पीज्या बां की कथा कहाणी के ||
भोळा पंडित के ले ले भागोत बांच कर थाणै मे |
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में |

जका चालता बेटा बांटै ,बै नितकी प्रसिद्ध रैया |
बिगड़ी तो बस चेली बिगड़ी संत सिद्ध का सिद्ध रैया ||
नै भी सिद्ध रैया तो कुण सो कटगो नाक ठिकाणै मे ||
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में |

बडै चाव सूँ नाम निकाल्यो , होगो घर हाळा भागी |
लगा नाम कै बट्टो खुद कै लखणा बणरयो निर भागी |
तूं उखडन सूँ नहीं आपक्यो थकग्यो गाँव जमाणै में |
खोयो ऊंट घडै मे ढूंढै क़सर नहीं है स्याणै में |
                                                                                - भागीरथ सिंह भाग्य 

Saturday, January 1, 2011

पातळ और पीथल - कन्हैया लाल सेठिया

हरे घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो।
नान्हो सो अमर्यो चीख पड्यो राणा रो सोयो दुख जाग्यो।
हूं लड्यो घणो हूं सह्यो घणो मेवाड़ी मान बचावण नै,
हूं पाछ नहीं राखी रण में बैर्यां री खात खिडावण में,
जद याद करूँ हळदीघाटी नैणां में रगत उतर आवै,
सुख दुख रो साथी चेतकड़ो सूती सी हूक जगा ज्यावै,
पण आज बिलखतो देखूं हूँ जद राज कंवर नै रोटी नै,
तो क्षात्र-धरम नै भूलूं हूँ भूलूं हिंदवाणी चोटी नै
मैं’लां में छप्पन भोग जका मनवार बिनां करता कोनी,
सोनै री थाल्यां नीलम रै बाजोट बिनां धरता कोनी,
ए  हाय जका करता पगल्या फूलां री कंवळी सेजां पर,
बै आज रुळै भूखा तिसिया हिंदवाणै सूरज रा टाबर,
आ सोच हुई दो टूक तड़क राणा री भीम बजर छाती,
आंख्यां में आंसू भर बोल्या मैं लिखस्यूं अकबर नै पाती,
पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,
मैं झुकूं कियां ? है आण मनैं कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां ? हूं सेस लपट आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूँ दिल्लीस तनैं समराट् सनेशो कैवायो।
राणा रो कागद बांच हुयो अकबर रो’ सपनूं सो सांचो,
पण नैण कर्यो बिसवास नहीं जद बांच नै फिर बांच्यो,
कै आज हिंमाळो पिघळ बह्यो कै आज हुयो सूरज सीतळ
कै आज सेस रो सिर डोल्यो आ सोच हुयो समराट् विकळ,
बस दूत इसारो पा भाज्यो पीथळ नै तुरत बुलावण नै,
किरणां रो पीथळ आ पूग्यो ओ सांचो भरम मिटावण नै,
बीं वीर बांकुड़ै पीथळ नै रजपूती गौरव भारी हो,
बो क्षात्र धरम रो नेमी हो राणा रो प्रेम पुजारी हो,
बैर्यां रै मन रो कांटो हो बीकाणूँ पूत खरारो हो,
राठौड़ रणां में रातो हो बस सागी तेज दुधारो हो,
आ बात पातस्या जाणै हो घावां पर लूण लगावण नै,
पीथळ नै तुरत बुलायो हो राणा री हार बंचावण नै,
म्है बाँध लियो है पीथळ सुण पिंजरै में जंगळी शेर पकड़,
ओ देख हाथ रो कागद है तूं देखां फिरसी कियां अकड़ ?
मर डूब चळू भर पाणी में बस झूठा गाल बजावै हो,
पण टूट गयो बीं राणा रो तूं भाट बण्यो बिड़दावै हो,
मैं आज पातस्या धरती रो मेवाड़ी पाग पगां में है,
अब बता मनै किण रजवट रै रजपती खून रगां में है ?
जंद पीथळ कागद ले देखी राणा री सागी सैनाणी,
नीचै स्यूं धरती खसक गई आंख्यां में आयो भर पाणी,
पण फेर कही ततकाळ संभळ आ बात सफा ही झूठी है,
राणा री पाघ सदा ऊँची राणा री आण अटूटी है।
ल्यो हुकम हुवै तो लिख पूछूं राणा नै कागद रै खातर,
लै पूछ भलांई पीथळ तूं आ बात सही बोल्यो अकबर,
म्हे आज सुणी है नाहरियो स्याळां रै सागै सोवै लो,
म्हे आज सुणी है सूरजड़ो बादळ री ओटां खोवैलो;
म्हे आज सुणी है चातगड़ो धरती रो पाणी पीवै लो,
म्हे आज सुणी है हाथीड़ो कूकर री जूणां जीवै लो
म्हे आज सुणी है थकां खसम अब रांड हुवैली रजपूती,
म्हे आज सुणी है म्यानां में तरवार रवैली अब सूती,
तो म्हांरो हिवड़ो कांपै है मूंछ्यां री मोड़ मरोड़ गई,
पीथळ नै राणा लिख भेज्यो आ बात कठै तक गिणां सही ?
पीथळ रा आखर पढ़तां ही राणा री आँख्यां लाल हुई,
धिक्कार मनै हूँ कायर हूँ नाहर री एक दकाल हुई,
हूँ भूख मरूं हूँ प्यास मरूं मेवाड़ धरा आजाद रवै हूँ
घोर उजाड़ां में भटकूं पण मन में मां री याद रवै,
हूँ रजपूतण रो जायो हूं रजपूती करज चुकाऊंला,
ओ सीस पड़ै पण पाघ नही दिल्ली रो मान झुकाऊंला,
पीथळ के खिमता बादल री जो रोकै सूर उगाळी नै,
सिंघां री हाथळ सह लेवै बा कूख मिली कद स्याळी नै?
धरती रो पाणी पिवै इसी चातग री चूंच बणी कोनी,
कूकर री जूणां जिवै इसी हाथी री बात सुणी कोनी,
आं हाथां में तलवार थकां कुण रांड़ कवै है रजपूती ?
म्यानां रै बदळै बैर्यां री छात्याँ में रैवैली सूती,
मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकै लो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,
जद राणा रो संदेश गयो पीथळ री छाती दूणी ही,
हिंदवाणों सूरज चमकै हो अकबर री दुनियां सूनी ही। 
                                                                       -  कन्हैया लाल सेठिया

Friday, December 10, 2010

शेखचिल्ली - जगदीश 'पेंटर'

मुक्की दे' र पापड फोडूं, लात की दे'र पतासो रे ,
मींगणी नै हदर उठा ल्यूँ, देखो यार तमासो रे |
 पाटा पर सूँ कूद ज्याऊं, नीम्बू निचोड़ दयूं  झटका सूँ,
फूसका नै फर उड़ा दयूं मैं नाड का लटका सूँ |
फूंक देकर चिमनी बुता दयूं तकियों उठा ल्यूँ हाथां सूँ ,
काम धंधो होवै कोनी घर चालरयो बाताँ सूँ  |
आधी रोटी सूँ पेट भरल्यां दो घूँट चाय की ,
दूध दही भावे  कोन्या उबाक आवै छाय की |
कीड़ी दाब कांख मै भागूँ कोई पकड़ ना पावे,
थर थर धूजे काया सारी म्हासूँ कुण टकरावे |
चालीस सेर को छैलो मै तो तुल्यां ताखड़ी टूटे रे,
पग पकड़'र झट मनाल्यूं जे घर हाली रूठे रे |    
होली दीवाली न्हावाँ धोवाँ करके तातो पाणी जी ,
खुडका सूँ डर के भागां या ही म्हारी पिछाणी जी |
माखी मार दयूं चूसो पकड़ क्यूं पण थाने भी तो क्यूं करणों है ,
थे भी मेरी तरियां हिम्मत करल्यो मरने सूँ के डरणो है |
कबड्डी का कोई पाला मांडे तो म्हारी कच्ची डाँई जी ,
थाला बैठ्या क्यूं तो कराँ जणा थाने या बात बतायी जी |   
                                                                                        - जगदीश 'पेंटर'

Thursday, November 11, 2010

पीर डोकरे री - जगदीश 'पेंटर'

इस कविता में कवि ऩे ग्रामीण परिवेश में एक आम जीवन व्यतीत करने वाले बूढ़े की पीड़ा दर्शाने की कोशिश की है |

आकाशाँ लाय लगा बैठ्या  भर पाताल में पाणी रै
च्यार यार मिल धुंओ साराँ कराँ बाताँ स्याणी स्याणी रै
घर बिध की बाताँ चाली में गैले जातो सुण लीनी
चोखी बुरी तो थे पिछाणो मेरै पल्ले पडी सो चुण लीनी

छोरी रै ब्याव रो करज चुकायो कर छाती ऩे काठी रे
घर धिराणी लड़ राखी आज ही बेच्यो गहणो गाठी रे
टाट बकऱ्याँ  लेगो कसाई गाय बळद लेगो बोहरो रे
आधी भूख काढऱ्या घर मै गयो दिसावर छोरो  रे

काल भायाँ सूँ न्यारा होया आज बेटो न्यारो कर दीन्यो
बैठक कमरा छोरा बाँट्या लैरलो ढारियो मैं  लीन्यो            .
गाँव रे नीडे खेत छोराँ को मेरी पाँती रोही मैं
बी मैं भी आधों गिरवे धर दीन्यो आधो जासी कमाई खोई मैं

धेलै  की तो कमाई कोन्या  घर हाली पडी है खाट मैं     
छोरी छोड़ सासरो आगी दायजे री आँट मैं
दो लाख नगद मांग ऱ्या एक इस्कूटर मांग्यो है
न्हातो भी सरमा ज्याऊ पैर राख्यो म्हीनाँ सूँ फाटेडो जाँघ्यो  है   

पीड  पडी का ना सगा समन्धी स्वारथ को सारो जीणों है
लिख्योड़ो लेख कदे न टलसी कदे हाँसणो कदे रोणो है
पीसाँ टकाँ री ईजत जग मै ज्ञानी रो कोई मोल नहीं
धीरज मन मैं धार भायला बाताँ रो कोई तोल नहीं   
                                                                            - जगदीश 'पेंटर'  

Tuesday, October 26, 2010

फतेहपुर आज्यो जी - जगदीश 'पेंटर'

देव दाता रो धाम निरालो, थे फतेहपुर आज्यो जी ,
घणी थारी मनवार करांला, सगला ऩे सागे ल्याज्यो जी ||

सेठ, सती और सूरमा, संताँ को है बास  अठे ,
छ ऋतु रो आणो जाणो, चन्दन जिस्यो घास अठे,
प्रेम प्रीत री बाताँ करस्यां, मौको मत बिसराज्यो जी,  
घणी थारी मनवार करांला, सगला ऩे सागे ल्याज्यो जी ||

बीड़, बावड़ी, जोहड़ न्यारा, देख्याँ मन हरसावे है,
मोर, पपीहा, कोयल बोले , रोम रोम मुसकावे है,
सगला आवो देखण ऩे, ई माटी रो करज चुकाज्यो जी,
घणी थारी मनवार कराँला , सगला ऩे सागे ल्याज्यो जी ||

केर साँगरा की तरकारी, रोटी मोठ  बाजरा की बणावाँगा,
देसी घी को दाल चूरमो, थाने घाल जिमावाँगा ,
दूध दही रा ठाठ मोकला, घने चाव सूँ खाज्यो जी,
घणी थारी मनवार करांला, सगला ऩे सागे ल्याज्यो जी ||  

ढारागढ़ सा हेली नोरा महलाँ बँगला ऩे मात करे,
कूँट कूँट पर मंदिर देवरा आकाशाँ सूँ बात करे,
संदेसो पढ़कर आया रीज्यो, म्हारो मान बढाज्यो जी,
घणी थारी मनवार करांला, सगला ऩे सागे ल्याज्यो जी ||  
                                                                             - जगदीश 'पेंटर'

Sunday, October 10, 2010

बतलावण दादा पोते री - बाबूलाल भोजक

दादों - तू के करसी के नहीं करसी
पोतो - थे के करता के नहीं करता
दादों - गाबाँ में चाय पिया पहली पग धरती तले धरे कोनी
          छापे में मूंड दियो राखे घर को धंधो सलटे कोनी
          आंख्यां पर राखे ढोबसिया मूंडे पर मूंछ क़तर राखी
          बाप जीवता बाळ दिया भदर में के कसर राखी
          तू के करसी के नहीं करसी
पोतो - थे के करता के नहीं करता
          कुर्तो सुथणीयो कडपदार हटड़ी पोथ्याँ सूँ भर राखी
          दिखे ज्यूं सुदो सांसर सो काया  तिरबंकी कर राखी
          बे अंग्रेजां का राज गया बे रीत रिवाज बले कोनी
          तेरो अण जुगतो हुनियारो घर काँ में कठे रले कोनी             
दादों -  तू के करसी के नहीं करसी
पोतो -  थे के करता के नहीं करता
दादों - ताम्बे के मोटे ढीगे ऩे हांडी में ल्हको ल्हको धरता
         गुड की गुडियानी लपसी सूँ म्हे सजन गोंठ सलटा देता
         सिणीया सा बढया झड़ूला पर बरसां सूँ राछ फिरा देता
         पचीस बरस का डांगर ऩे दे चिटकी च्यार भुला देता     
         धोती मण मेल भरी रहती बंड़ी चिटे स्यूं गळ ज्याती
         छाछ मेट  के धोवण स्यूं धोता तो जूवां झड ज्याती
         तू के करसी के नहीं करसी 
                                                                                - बाबूलाल भोजक
                                                                           राजस्थानी  फिल्म कलाकार   
                                                                                 फ़तेहपुर शेखावाटी

Thursday, September 30, 2010

वाह भई शेखावाटी - मुरली मनोहर बासोतिया

रामदेव जी पीर ओलिया , मुस्लिम धोकै न्यारा,
हिन्दू पूजे सकरबार सा , नरहड़ जाय परबारा |
ईद दिवाली परब मुबारक , ना रे किन्तु परन्तु ,
मंचित अठे रामलीला, मिल करे मुसलमां हिन्दू |
निरगुण निराकार परमेसर, ना अल्ला की जाति,
हिन्दू मुसलमां भाई भाई वाह भई शेखावाटी ||    

                                    मुरली मनोहर बासोतिया
                       रचित ' वाह भई शेखावाटी' पुस्तक से उद्धृत 

Thursday, September 23, 2010

भारत नै यूरोप बना दयांगा - पं नवल किशोर खेडवाल

हिन्द हिन्दी नै भूले तो हिन्दी और पढैलो  कुण,
गीता कुरान पडी रवैली बी रो पाठ करैलो कुण ,
थोड़ी मोमीन मिटाग्या था थोड़ी अंग्रेज मिटाग्या ,
और थोड़ी सी और मिटा दयांगा,
मत घबराओ साथीड़ा,  भारत नै यूरोप बना दयांगा,      
दूध दही नै छा नै भूल्या,  भूल्या इतिहास पुराणै   नै,
बिस्कुट चाय डबल रोटी बस रहगी फैशन खाणै में ,
टाबर अंग्रेज बणाबा री सगलाँ  रै मन में आ री है ,
छोरयाँ भी लारै क्यूँ  रहसी बै  भी बाल कटा री है
डब्बू गब्बू  बंटी पप्पू यै नाम सुण्या म्हे कूताँ  का  
बड़े गरब सूँ आज कढाया  म्हे  ही म्हारै पूताँ  का
म्हारै घर री इज्जत औरत ही अब कल्बा में नाच करावाँला
पतिव्रता और सती शब्द पर प्रतिबन्ध लगावाँला  
के ई दिन रे खाता ही सीमा पर गोल्याँ खाई थी
हंस हंस के फांसी चढ़रया था बे मौत ऩे गले लगाई थी   
यै  घर रा दिवला घर बाले तो घर ऩे अब  बचावैलों  कुण
गीता कुरान पडी रहसी बी रो पाठ करैलो कुण

Thursday, September 16, 2010

मत पूछै के ठाठ भायला - महावीर जोशी


यह कविता झुंझुनू जिले के बसावता खुर्द गाँव के रहने वाले कवि श्री महावीर जी जोशी ने लिखी है |  कविता में एक मित्र दूसरे मित्र को अपनी जवानी और वृद्धावस्था की तुलना करके अपनी हालत का वर्णन कर रहा है 


मत पूछे के ठाठ भायला | पोळी में है  खाट भायला || 
पनघट पायल बाज्या करती ,सुगनु चुड़लो हाथा मै | 
रूप रंगा रा मेला भरता ,रस बरस्या करतो बातां मै | 
हाँस हाँस कामन घणी पूछती , के के गुज़री राताँ  मै | 
घूंघट माई लजा बीनणी ,पल्लो देती दांता मै | 
नीर बिहुणी हुई बावड़ी , सूना पणघट घाट भायला | पोळी मै है खाट भायला ||

छल छल जोबन छ्ळ्क्या करतो ,गोटे हाळी कांचली | 
मांग हींगलू नथ रो मोती ,माथे रखडी सांकली | 
जगमग जगमग दिवलो जुगतो ,पळका पडता गैणा मै | 
घणी हेत सूं सेज सजाती ,काजल सारयां नैणा मै | 
उन नैणा मै जाळा पड़गा ,देख्या करता बाट भायला | पोळी मै है खाट भायला||

अतर छिडकतो पान चबातो नैलै ऊपर दैलो | 
दुनिया कैती कामणगारो ,अपने जुग को छैलो हो | 
पण बैरी की डाढ रूपि ना, इतनों बळ हो लाठी मैं | 
तन को बळ मन को जोश झळकणो ,मूंछा हाली आंटी मै ||| 
इब तो म्हारो राम रूखाळो , मिलगा दोनूं पाट भायला | पोळी मै है खाट भायला||

बिन दांता को हुयो जबाडो चश्मों चढ़ग्यो  आख्याँ मै | 
गोडा मांई पाणी पडगो जोर बच्यो नी हाथां मै | 
हाड हाड मै पीड पळै है रोम रोम है अब खाई | 
छाती कै मा कफ घरडावै खाल डील की लटक्याई || 
चिठियो  म्हारो साथी बणगो ,डगमग हालै टाट भायला | पोळी मै है खाट भायला ||

Thursday, September 9, 2010

गोखे बैठी शाम

सेठ बस्या कलकत्ता बम्बई डिबरूगढ़ आसाम 
चाकर ठीड़े बैठ्या बैठ्या काटी उमर तमाम 
कुण सूँ मुजरा करै हवेल्याँ बरसां मिलै न राम 
बाटडली जोवै आवण  री गोखे बैठी शाम    
 - अज्ञात 

Sunday, September 5, 2010

मायड़ भासा - ओम पुरोहित ' कागद'

राज बणाया राजव्यां,भाषा थरपी ज्यान । 
बिन भाषा रै भायला,क्यां रो राजस्थान ॥१॥ 
रोटी-बेटी आपणी,भाषा अर बोवार । 
राजस्थानी है भाई,आडो क्यूं दरबार ॥२॥ 
राजस्थानी रै साथ में,जनम मरण रो सीर । 
बिन भाषा रै भायला,कुत्तिया खावै खीर ।।३॥ 
पंचायत तो मोकळी,पंच बैठिया मून । 
बिन भाषा रै भायला,च्यारूं कूंटां सून ॥४॥ 
भलो बणायो बाप जी,गूंगो राजस्थान । 
बिन भाषा रै प्रांत तो,बिन देवळ रो थान॥५॥ 
आजादी रै बाद सूं,मून है राजस्थान । 
अपरोगी भाषा अठै,कूकर खुलै जुबान ॥६॥ 
राजस्थान सिरमोड है,मायड भाषा मान । 
दोनां माथै गरब है,दोनां साथै शान ॥७॥ 
बाजर पाकै खेत में,भाषा पाकै हेत । 
दोनां रै छूट्यां पछै,हाथां आवै रेत ॥८॥ 
निज भाषा सूं हेत नीं,पर भाषा सूं हेत । 
जग में हांसी होयसी,सिर में पड्सी रेत ॥९॥ 
निज री भाषा होंवतां,पर भाषा सूं प्रीत । 
ऐडै कुळघातियां रो ,जग में कुण सो मीत ॥१०॥ 
घर दफ़्तर अर बारनै,निज भाषा ई बोल । 
मायड भाषा रै बिना,डांगर जितनो मोल ॥११॥ 
मायड भाषा नीं तजै,डांगर-पंछी-कीट । 
माणस भाषा क्यूं तजै, इतरा क्यूं है ढीट ॥१२॥ 
मायड भाषा रै बिना,देस हुवै परदेस । 
आप तो अबोला फ़िरै,दूजा खोसै केस ॥१३॥ 
भाषा निज री बोलियो,पर भाषा नै छोड । 
पर भाषा बोलै जका,बै पाखंडी मोड ॥१४॥ 
मायड भाषा भली घणी, ज्यूं व्है मीठी खांड । 
पर भाषा नै बोलता,जाबक दीखै भांड ॥१५॥ 
जिण धरती पर बास है,भाषा उण री बोल । 
भाषा साथ मान है , भाषा लारै मोल ॥१६॥ 
मायड भाषा बेलियो,निज रो है सनमान । 
पर भाषा नै बोल कर,क्यूं गमाओ शान ॥१७॥ 
राजस्थानी भाषा नै,जितरो मिलसी मान । 
आन-बान अर शान सूं,निखरसी राजस्थान ॥१८॥ 
धन कमायां नीं मिलै,बो सांचो सनमान । 
मायड भाषा रै बिना,लूंठा खोसै कान ॥१९॥ 
म्हे तो भाया मांगस्यां,सणै मान सनमान । 
राजस्थानी भाषा में,हसतो-बसतो रजथान ॥२०॥ 
निज भाषा नै छोड कर,पर भाषा अपणाय । 
ऐडै पूतां नै देख ,मायड भौम लजाय ॥२१॥ 
भाषा आपणी शान है,भाषा ही है मान । 
भाषा रै ई कारणै,बोलां राजस्थान ॥२२॥ 
मायड भाषा मोवणी,ज्यूं मोत्यां रो हार । 
बिन भाषा रै भायला,सूनो लागै थार ॥२३॥ 
जिण धरती पर जळमियो,भाषा उण री बोल । 
मायड भाषा छोड कर, मती गमाओ डोळ ॥२४॥ 
हिन्दी म्हारो काळजियो,राजस्थानी स ज्यान । 
आं दोन्यूं भाषा बिना,रै’सी कठै पिछाण ॥२५॥ 
राजस्थानी भाषा है,राजस्थान रै साथ । 
पेट आपणा नीं पळै,पर भाषा रै हाथ ॥२६
                                                     ===ओम पुरोहित’कागद’ 
                                                   साभार from www.omkagad.blogspot.com 

Friday, September 3, 2010

कहीं नोरा पड्या - दौलतराम छाजेड

कहीं नोरा पड्या कहीं बाड़ा पड्या
कहीं खेत का खेत उजाड्या पड्या
कहीं खेजडा खोखां सै बोझ मरै
कहीं लूँग बिचारा का झाड्या पड्या
कहीं घोचाँ सूँ नीठ रसोई बनै
कहीं ढारा मैं लक्कड़ फाड्या पड्या
कहीं रंग सुरंगी हवेली घणी
कहीं बोदी मैं चीर दराड़ा पड्या
कहीं सूनी हवेली मैं सून घणी
कहीं घुबारयाँ मैं बीसाँ ही बाड्या  पड्या
कहीं खद्दर को मिलै ना चादरों
कहीं रेशम मलमल फाड्या पड्या
कहीं अन्न बिना नित मन दुखी
कहीं दाड़िम दाख सिंघाड़ा पड्या
कहीं ब्याज क़ि आय को पार नहीं
कहीं भाड़ेती का चढ्या भाड़ा पड्या
कहीं जेब मैं एक दुअन्नी नहीं
कहीं नोटां का ताड़ा का ताड़ा पड्या
कहीं भाटां का टाबर साफ़ घणा
कहीं सेडै सूँ नास लिवाड्या  पड्या
कहीं साँची भी रांड कहवे तो डरै
कहीं झूठा ही झोड़ झपाड़ा पड्या
कह दौलत कर्म कथा सगली
कहीं सून्धा पड्या ऊंधा पड्या